तेनाली राम की कहानियां

   

तेनाली राम की कहानियां - tenali rama story in hindi

आप लोगों ने कभी ना कभी तो तेनाली रामा या तेनाली रामाकृष्ण की कहानी पढ़ी होगी. स्कूलों की किताबों में भी तेनाली रामा की कहानियों का जिक्र किया जाता है. तेनाली रामा एक कवि होने के साथ-साथ एक चतुर इंसान भी थे. उन्होंने अपने जीवन काल में कई तरह की कविताएं लिखी हैं और वो अपने बुद्धि और हास्य के लिए काफी जाने जाते थे। आज हम आपको तेनाली राम की कहानियां और उनके जीवन के बारे में जुड़ी कुछ रोचक बाते बताने जा रहे हैं। 

 

तेनाली राम का परिचय 


माना जाता है कि तेनाली राम का जन्म 16वीं शताब्दी में आंध्रप्रदेश राज्य में हुआ था। के गुन्टूर जिले के गाँव – गरलापाडु में हुआ था। तेनालीराम एक तेलुगू  ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। वहीं जन्म के समय इनका नाम गरलापति रामाकृष्ण था। तेलगु ब्राह्मण परिवार से नाता रखने वाले रामा के पिता गरलापति रमय्या एक पंड़ित हुआ करते थे और तेनाली गाँव के रामलिंगेश्वरास्वामी मंदिर के पुजारी  थे।जबकि उनकी मां लक्ष्मम्मा घर संभालती थी. कहा जाता है कि जब तेनाली रामा छोटे थेतभी उनके पिता का निधन हो गया था. जिसके बाद उनकी मांउनको लेकर अपने माता-पिता के यहां चली गई थी. उनकी मां के गांव का नाम ‘तेनाली’ था। 


  • पूरा नाम               तेनाली रामाकृष्ण
  • जन्म तिथि             16वीं शताब्दी
  • उपनाम                “विकट कवि”
  • जन्म स्थान            गुंटूर जिलेआंध्रप्रदेश
  • पत्नी का नाम         जानकारी नहीं


# तेनाली रामा की शिक्षा 

 

आप लोगों को ये जानकर हैरानी होगीकि इतने महान कवि ने किसी भी तरह की शिक्षा प्राप्त नहीं की थी. अशिक्षित होने के बावजूद तेनाली रामा ने मराठीतमिल और कन्नड़ जैसी भाषाओं में महारथ हासिल की हुई थी, वहीं माना जाता है कि तेनाली जी ने वैष्णव धर्म अपना लिया था. अपनी जरुरतों को पूरा करने के मकसद से वो भागवत मेला की प्रसिद्द मंडली में काम करने लगे थे. इस मंडली का हिस्सा बनकर उन्होंने कई तरह के कार्यक्रम किए थे। 

तेनालीराम को पाठशाला का विधिवत अभ्यास नहीं प्राप्त हुआ था, पर उनकी सीखने की तीव्र इच्छा और ज्ञान के प्रति धुन, के कारण उन्हे शिश्यावृति प्राप्त हुई थी। परंतु उनके पूर्व शिव भक्त होने के कारण उन्हे वैष्णव अनुयायियों द्वारा एक शिष्य की तरह स्वीकारा नहीं गया था। 

 

# तेनाली और राजा कृष्णदेवराय कि जोड़ी 

 

वर्ष 1509 से 1529 तक विजयनगर की राजगद्दी पर विराजमान थे,विजयनगर राज्य के राजा कृष्णदेवराय और तेनाली की जोड़ी को अकबर और बीरबल की जोड़ी के समान माना जाता है. तेनाली ने राजा कृष्णदेवराय के दरबार में एक कवि के रूप में काम करना शुरू किया था. कहा जाता है कि एक बार जब तेनाली रामा अपनी मडंली के साथ विजयनगर में एक कार्यक्रम कर रहे थे

तब उनकी पहली बार मुलाकात कृष्णदेवराय से हुई थी और राजा को उनके द्वारा किया गया प्रदर्शन काफी पसंद आया था. जिसके बाद राजा ने उन्हें अपने दरबार में एक कवि का कार्य सौपा था. लेकिन तेनाली इतने चतुर थे कि उन्होंने धीरे-धीरे अपनी बुद्धिमानी से राजा के और करीब आ गए. राजा जब भी किसी परेशानी में हुआ करते थेतो सलाह के लिए अपने आठ कवि में से केवल तेनाली राम को  ही याद किया करते थे 

 

# तेनाली राम

 

तेनाली रामा की  कहानियां (Tenali Raman hindi story )

ऊपर दिए गए उनके जीवन परिचय को पढ़कर आप ये सोच रहे होंगेकि आखिर उन्होंने ऐसा क्या किया था कि इस सदी में भी उनको याद किया जाता है. क्यों उनको बुद्धिमान और चतुर व्यक्ति माना जाता है. आपके इन्हीं सवाल का जवाब आपको नीचे दी गई उनके जीवन की घटनाओं को पढ़कर मिल जाएगा। उनकी बुद्धि चातुर्य और ज्ञान बोध से जुड़ी कई कहानिया है जिनमे से कुछ चुनिन्दा कहानियाँ नीचे बताई गयी हैं।


तेनाली रामा की बच्चों के लिए मजेदार कहानी (Tenali Raman Funny Stories For Kids)
 

#  व्यापारी और तेनाली की कहानी 

एक बार राजा कृष्णदेवराय के दरबार में एक विदेशी व्यापारी आया था. इस व्यापारी ने राजा से मुलाकात कर कहा कि उसने सुना है कि राजा के पास कई सारे मंत्री हैं और उसने इन मंत्रियों की बुद्धिमानी के बारे में काफी कुछ सुना हुआ है।  इस व्यापारी ने राजा से अनुमति मांगीकि वो उनके मंत्रियों के ज्ञान की परीक्षा लेना चाहता है। 

राजा ने भी उस व्यापारी की बात मान ली और कहा कि वो उनके मंत्रियों की बुद्धिमानी की परीक्षा ले सकते है. फिर क्या था व्यापारी ने राजा को तीन गुड़ियां दी. ये तीनों गुड़िया दिखने में एक जैसी थी. गुड़िया राजा को देने के बाद व्यापारी ने राजा से कहा कि आपके मंत्री मुझे तीस दिन के अंदरएक जैसी दिखने वाली इन गुड़ियों में क्या अंतर है ये बताएं. राजा ने भी व्यापारी की बात मानते हुए अपने राज्य के मंत्रियों को बुलाया और उन्हें ये कार्य करने को दिया। 

 

हालांकि राजा ने तेनाली रामा को ये कार्य नहीं सौंपा था. लेकिन लंबे समय तक कोई भी मंत्री ये नहीं बता पायाकि आखिर एक जैसी दिखने वाली इन गुड़ियों में क्या अंतर है. फिर राजा ने यही कार्य तेनाली रामा को सौंपा और जैसे ही तीस दिन पूरे हो गएवो व्यापारी राजा के दरबार में अपनी चुनौती का जवाब मांगने आया।  

फिर क्या था तेनाली रामा ने उस व्यापारी को कहा कि इन तीन गुड़ियों में से एक गुड़िया अच्छी हैएक ठीक-ठाक है जबकि एक बहुत बुरी है. तेनाली रामा के इस जवाब को सुनकर सब हैरान रह गएकि आखिर किस आधार पर तेनाली ने ये जवाब दिया, फिर तेनाली रामा ने सबके सामने एक गुड़िया के कान में एक तार डाली और वो तार गुड़िया के मुंह से निकल आई।  

फिर इसी तरह उन्होंने दूसरी गुड़िया के कान में तार डाली और वो तार उस गुड़िया के दूसरे कान से निकल गई. और अंतिम गुड़िया के कान में तार डालने पर वो तार किसी भी जगह से बाहर नहीं निकली. जिसके बाद तेनाली रामा ने कहाकि जिस गुड़िया के मुंह से तार बाहर निकली है वो गुड़िया बुरी है. 

क्योंकि उसको अगर कोई कुछ बताएगातो वो सबको उस बात की जानकारी दे देगी. वहीं जिस गुड़िया के कान से तार निकली वो गुड़िया ठीक ठाक हैक्योंकि अगर उसे कोई कुछ बताएगातो वो उसको ध्यान से नहीं सुनेंगी. वहीं जो आखिरी गुड़िया हैउसे जो कोई कुछ बताएगा वो उसे अपने दिल के अंदर रखेगी. इसलिए वो गुड़िया अच्छी है. इस तरह से तेनाली रामा द्वारा दिए गए जवाब को सुनकर राजा के साथ साथ वो व्यापारी भी हैरान रह गए। 

लेकिन तेनाली यहां पर ही नहीं रुके उन्होंने इन गुड़ियों के बारे में कहाकि पहली गुड़ियां उन लोगों में से है जो कि ज्ञान सुनकर लोगों में बांटती है. बल्कि दूसरी गुड़िया उन लोगों में से है जिनको जो सिखाया जाता है उन्हें वो समझ नहीं आता है और आखिरी गुड़िया उन लोगों में से है जो कि ज्ञान को अपने तक ही सीमित रखती हैं. तेनाली के इस जवाब को भी सुनकर राजा काफी खुश हुए. उस व्यापारी को भी समझ आ गयाकि उसने जो राजा के मंत्री की बुद्धिमानी के बारे में सुना था वो एकदम सही था। 

 

# चोर और तेनाली राम की कहानी 

 

एक बार तेनाली रामा अपनी पत्नी के साथ रात को अपने घर में सो रहे थे. तभी अचानक उन्होंने कुछ आवाज सुनी. तेनाली रामा को आवाज सुनकर शक हो गया कि कुछ चोर उनके घर चोरी करने आए हैं. तेनाली ने अपनी पत्नी को कहा कि लगता है कोई चोरी करने आया हैतो हम अपने कीमती समान को एक थेली में डाल कर कुएं के अंदर फेंक आते हैं।  

जिसके बाद तेनाली अपनी पत्नी के साथ कुएं में अपने कीमती समान से भरी थेली फेंक आएं. वहीं चोरों ने उनकी बात सुन ली थी और वो चोर कुएं में जाकर ,कुएं का पानी निकालने लगे. पूरी रात कड़ी मेहनत करने के बाद जब चोरों के हाथों वो थेली लगीतो उस थेली में पत्थर थे. जिसके बाद वहां तेनाली आए और उन्होंने चोरों का धन्यवाद करते हुए कहा किशुक्रिया आप लोगों ने मेरे बाग में फूलों को पानी दिया और कुएं को साफ कर दिए. जिसके बाद वो चोर हैरान रहे गए और उन्होंने अपनी इस हरकत के लिए तेनाली से माफी मांगीऔर उन्होंने कहा कि वो किसी को भी ये ना बताएं कि वो चोर है. तेनाली ने उनसे वादा किया कि वो किसी को भी कुछ नहीं बताएंगे. लेकिन उनको चोरी छोड़नी पड़ेगीजिसके बाद इन चोरों ने मेहनत करके पैसे कमाने शुरू कर दिए। 


#Tenali Rama Stories in Hindi – अरबी घोड़े 


महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में एक दिन एक अरब प्रदेश का व्यापारी घोड़े बेचने आता है। वह अपने घोड़ो का बखान कर के महाराज कृष्णदेव राय को सारे घोड़े खरीदने के लिए राजी कर लेता है तथा अपने घोड़े बेच जाता है। अब महाराज के घुड़साल इतने अधिक घोड़े हो जाते हैं कि उन्हें रखने की जगह नहीं बचती, इसलिए महाराज के आदेश पर बहुत से घोड़ों को विजयनगर के आम नागरिकों और राजदरबार के कुछ लोगों को तीन महीने तक देखभाल के लिए दे दिया जाता है। हर एक देखभाल करने वाले को घोड़ों के पालन खर्च और प्रशिक्षण के लिए प्रति माह एक सोने का सिक्का दिया जाता है।


विजयनगर के सभी नागरिकों की तरह चतुर तेनालीराम को भी एक घोडा दिया गया। तेनालीराम ने घोड़े को घर लेजा कर घर के पिछवाड़े एक छोटी सी घुड़साल बना कर बांध दिया। और घुड़साल की नन्ही खिड़की से उसे हर रोज थोड़ी मात्रा में चारा खिलाने लगे।


बाकी लोग भी महाराज कृष्णदेव राय की सौंपी गयी ज़िम्मेदारी को निभाने लगे। महाराज नाराज ना हो जाए और उन पर क्रोधित हो कोई दंड ना दे दें; इस भय से सभी लोग अपना पेट काट-काट कर भी घोड़े को उत्तम चारा खरीद कर खिलाने लगे।


ऐसा करते-करते तीन महीने बीत जाते हैं। तय दिन सारे नागरिक घोड़ो को ले कर महाराज कृष्णदेव राय के समक्ष इकठ्ठा हो जाते हैं। पर तेनालीराम खाली हाथ आते हैं। राजगुरु तेनालीराम के घोड़ा ना लाने की वजह पूछते है। तेनालीराम उत्तर मे कहते है कि घोड़ा काफी बिगडैल और खतरनाक हो चुका है, और वह खुद उस घोड़े के समीप नहीं जाना चाहते हैं। राजगुरु , महाराज कृष्णदेव राय को कहते है के तेनालीराम झूठ बोल रहे है। महाराज कृष्णदेव राय सच्चाई का पता लगाने के लिए और तेनालीराम के साथ राजगुरु को भेजते हैं।


तेनालीराम के घर के पीछे बनी छोटी सी घुड़साल देख राजगुरु कहते है कि अरे मूर्ख मानव तुम इस छोटी कुटिया को घुड़साल कहते हो? तेनालीराम बड़े विवेक से राजगुरु से कहते है के क्षमा करें मैं आप की तरह विद्वान नहीं हूँ। कृपया घोड़े को पहले खिड़की से झाँक कर देख लें। और उसके पश्चात ही घुड़साल के अंदर कदम रखें।


राजगुरु जैसे ही खिड़की से अंदर झाँकते हैं, घोडा लपक कर उनकी दाढ़ी पकड़ लेता है। लोग जमा होने लगते हैं। काफी मशक्कत करने के बाद भी भूखा घोड़ा राजगुरु की दाढ़ी नहीं छोड़ता है। अंततः कुटिया तोड़ कर तेज हथियार से राजगुरु की दाढ़ी काट कर उन्हे घोड़े के चंगुल से छुड़ाया जाता है। परेशान राजगुरु और चतुर तेनालीराम भूखे घोड़े को ले कर राजा के पास पहुँचते हैं।


घोड़े की दुबली-पतली हालत देख कर महाराज कृष्णदेव राय तेनालीराम से इसका कारण पूछते हैं। तेनालीराम कहते है कि मैं घोड़े को प्रति दिन थोड़ा सा चारा ही देता था, जिस तरह आप की गरीब प्रजा थोड़ा भोजन कर के गुजारा करती है। और आवश्यकता से कम सुविधा मिलने के कारण घोडा और व्यथित और बिगड़ेल होता गया। ठीक वैसे ही जैसे के आप की प्रजा परिवार पालन की जिम्मेदारी के अतिरिक्त, घोड़ो को संभालने के बोझ से त्रस्त हुई।


राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना होता है। उन पर अधिक बोझ डालना नहीं। आपके दिये हुए घोड़े पालने के  कार्य-आदेश से घोड़े तो बलवान हो गए पर आप की प्रजा दुर्बल हो गयी है। महाराज कृष्णदेव राय को तेनालीराम की यह बात समझ में आ जाती है, और वह तेनालीराम की प्रसंशा करते हुए उन्हे पुरस्कार देते है।



 

# तेनाली और बिल्ली की कहानी 

 

एक बार राज्य में चूहों ने लोगों को काफी परेशान कर दिया था. लोगों के घरों में इतने चूहें हो गए थे कि वो घर में रखा सारा खाना और कपड़ों को खराब कर देते थे. जब ये बात राजा के पास पहुंची तो राजा ने राज्य के सभी लोगों को आदेश दिया कि उन्होंने अपने घर में एक बिल्ली पालनी होगी. ताकि चूहों को बिल्ली खा लें और परेशानी का समाधान निकल जाए. लेकिन राज्य की जनता के पास इतना दूध नहीं हुआ करता था कि वो बिल्ली को भी दूध दे सकें. वहीं जनता की इस समस्या का हल करते हुए राजा ने हर घर के लिए एक गाय देने का फैसला किया .

 

वहीं तेनाली को दूध बहुत पसंद था और वो नहीं चाहते थे की बिल्ली को दूध दिया जाए. इसलिए वो रोज बिल्ली के लिए गर्म दूध रखते थे ताकि बिल्ली उस दूध को पी ना सकें. तेनाली रामा की ये तरकीब काम कर गई और बिल्ली जब भी दूध पीने जाती तो गर्म दूध देख वो दूध को पी नहीं पाती थी. और इस तरह तेनाली को सारा दूध पीने को मिल जाता था. वहीं एक दिन राजा ने आदेश दिया की गांव के सभी लोग अपनी बिल्ली के साथ राज दरबार में पेश हों. 

जब राजा ने दरबार में सभी बिल्लियों को देखातो सिर्फ तेनाली की बिल्ली काफी कमजोर नजर आई. राजा ने तेनाली से पूछा की तुम्हारी बिल्ली इतनी कमजोर क्यों है. तेलानी ने कहा कि उसकी बिल्ली को दूध पीना पंसद नहीं है. राजा को तेनाली की बात पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने बिल्ली को उनके सामने दूध पिलाने का आदेश दिया. जैसे बिल्ली के सामने दूध रखा गया तो बिल्ली को लगा की ये दूध गर्म होगा और बिल्ली ने इस तरह से वो दूध नहीं पिया. और तेलानी को राजा द्वारा कोई दंड नहीं दिया और गाय का सारा दूध तेलानी को मिलने लगा.

 

ऊपर बताई गई कहानी से साफ पता चलता है कि तेनाली अपनी समझ से किस तरह हर बार लोगों को हैरान कर देते थे. इतना ही नहीं उनकी समझ के कारण बड़ी सी बड़ी परेशानी को हल किया जाता था.

 

# Tenali Raman Stories in Hindi – स्वर्ग की खोज

महाराज कृष्णदेव राय अपने बचपन में सुनी कथा अनुसार यह विश्वास करते थे कि संसार-ब्रह्मांड की सबसे उत्तम और मनमोहक जगह स्वर्ग है। एक दिन अचानक महाराज को स्वर्ग देखने की इच्छा उत्पन्न होती है, इसलिए दरबार में उपस्थित मंत्रियों से पूछते हैं, ” बताइए स्वर्ग कहाँ है ?”


 सारे मंत्रीगण सिर खुजाते बैठे रहते हैं पर चतुर तेनालीराम महाराज कृष्णदेव राय को स्वर्ग का पता बताने का वचन देते हैं। और इस काम के लिए दस हजार सोने के सिक्के और दो माह का समय मांगते हैं।

 

महाराज कृष्णदेव राय तेनालीराम को सोने के सिक्के और दो माह का समय दे देते हैं और शर्त रखते हैं कि अगर तेनालीराम ऐसा न कर सके तो उन्हे कड़ा दंड दिया जाएगा। अन्य दरबारी तेनालीराम की कुशलता से काफी जलते हैं। और इस बात से मन ही मन बहुत खुश होते हैं कि तेनालीराम स्वर्ग नहीं खोज पाएगा और सजा भुगतेगा।


दो माह की अवधि बीत जाती है, महाराज कृष्णदेव राय तेनालीराम को दरबार में बुलवाते हैं। तेनालीराम कहते हैं के उन्होने स्वर्ग ढूंढ लिया है और वे कल सुबह स्वर्ग देखने के लिए प्रस्थान करेंगे।


अगले दिन तेनालीराम, महाराज कृष्णदेव राय और उनके खास मंत्रीगणों  को एक सुंदर स्थान पर ले जाते हैं। जहां खूब हरियाली, चहचहाते  पक्षी, और वातावरण को शुद्ध करने वाले पेड़ पौधे होते हैं। जगह का सौंदर्य देख महाराज कृष्णदेव राय अति प्रसन्न होते हैं। पर उनके अन्य मंत्री गण स्वर्ग देखने की बात महाराज कृष्णदेव राय को याद दिलाते रहते हैं।


महाराज कृष्णदेव राय भी तेनालीराम से उसका वादा निभाने को कहते हैं। उसके जवाब में तेनालीराम कहते हैं कि जब हमारी पृथ्वी पर फल, फूल, पेड़, पौधे, अनंत प्रकार के पशु, पक्षी, और अद्भुत वातावरण और अलौकिक सौन्दर्य है।  फिर स्वर्ग की कामना क्यों? जबकि स्वर्ग जैसी कोई जगह है भी इसका कोई प्रमाण नहीं है।


महाराज कृष्णदेव राय को चतुर तेनालीराम की बात समझ आ जाती है और वो उनकी प्रसंशा करते हैं।बाकी मंत्री जलन के मारे महाराज को दस हज़ार सोने के सिक्कों की याद दिलाते हैं। तब महाराज कृष्णदेव राय तेनालीराम से पूछते हैं कि उन्होंने उन सिक्को का क्या किया?


तब तेनालीराम कहते हैं कि वह तो उन्होने खर्च कर दिये!


तेनालीराम कहते हैं कि आपने जो दस हजार सोने के सिक्के दिये थे उनसे मैंने इस जगह से उत्तम पौधे और उच्च कोटी के बीज खरीदे हैं। जिनको हम अपने राज्य विजयनगर की जमीन में प्रत्यर्पित करेंगे; ताकि हमारा राज्य भी इस सुंदर स्थान के समीप आकर्षक और उपजाऊ बन जाए।


महाराज इस बात से और भी प्रसन्न हो जाते हैं और तेनालीराम को ढेरों इनाम देते हैं। और एक बार फिर बाकी मंत्री अपना सा मुंह ले कर रह जाते हैं। 


# तेनालीराम की  हिंदी कहानियाँ    -   अंगूठी चोर

महाराजा कृष्ण देव राय एक कीमती रत्न जड़ित अंगूठी पहना करते थे। जब भी वह दरबार में उपस्थित होते तो अक्सर उनकी नज़र अपनी सुंदर अंगूठी पर जाकर टिक जाती थी। राजमहल में आने वाले मेहमानों और मंत्रीगणों से भी वह बार-बार अपनी उस अंगूठी का ज़िक्र किया करते थे।


एक बार राजा कृष्ण देव राय उदास हो कर अपने सिंहासन पर बैठे थे। तभी तेनालीराम वहाँ आ पहुंचे। उन्होने राजा की उदासी का कारण पूछा। तब राजा ने बताया कि उनकी पसंदीदा अंगूठी खो गयी है, और उन्हे पक्का शक है कि उसे उनके बारह अंग रक्षकों में से किसी एक ने चुराया है।


चूँकि राजा कृष्ण देव राय का सुरक्षा घेरा इतना चुस्त होता था की कोई चोर-उचक्का या सामान्य व्यक्ति उनके नज़दीक नहीं जा सकता था।

तेनालीराम ने तुरंत महाराज से कहा कि-


मैं अंगूठी चोर को बहुत जल्द पकड़ लूँगा। 


यह बात सुन कर राजा कृष्ण देव राय बहुत प्रसन्न हुए। उन्होने तुरंत अपने अंगरक्षकों को बुलवा लिया।


तेनालीराम बोले, “राजा की अंगूठी आप बारह अंगरक्षकों में से किसी एक ने की है। लेकिन मैं इसका पता बड़ी आसानी से लगा लूँगा। जो सच्चा है उसे डरने की कोई ज़रुरत नहीं और जो चोर है वह कठोर दण्ड भोगने के लिए तैयार हो जाए।”


तेनालीराम ने बोलना जारी रखा, “आप सब मेरे साथ आइये हम सबको काली माँ के मंदिर जाना है।”


राजा बोले, ” ये कर रहे हो तेनालीराम हमें चोर का पता लगाना है मंदिर के दर्शन नहीं कराने हैं!”


“महाराज, आप धैर्य रखिये जल्द ही चोर का पता चल जाएगा।”, तेनालीराम ने राजा को सब्र रखने को कहा।


मंदिर पहुँच कर तेनालीराम पुजारी के पास गए और उन्हें कुछ निर्देश दिए। इसके बाद उन्होंने अंगरक्षकों से कहा, ” आप सबको बारी-बारी से  मंदिर में जा कर माँ काली की मूर्ति के पैर छूने हैं और फ़ौरन बाहर निकल आना है। ऐसा करने से माँ काली आज रात स्वप्न में मुझे उस चोर का नाम बता देंगी।


अब सारे अंगरक्षक बारी-बारी से मंदिर में जा कर माता के पैर छूने लगे। जैसे ही कोई अंगरक्षक पैर छू कर बाहर निकलता तेनालीराम उसका हाथ सूंघते आर एक कतार में खड़ा कर देते। कुछ ही देर में सभी अंगरक्षक एक कतार में खड़े हो गए।


महाराज बोले, “चोर का पता तो कल सुबह लगेगा, तब तक इनका क्या किया जाए?”


नहीं महाराज, चोर का पता तो ला चुका है। सातवें स्थान पर खड़ा अंगरक्षक ही चोर है।


ऐसा सुनते ही वह अंगरक्षक भागने लगा, पर वहां मौजूद सिपाहियों ने उसे धर दबोचा, और कारागार में डाल दिया.

 

राजा और बाकी सभी लोग आशार्यचाकित थे कि तेनालीराम ने बिना स्वप्न देखे कैसे पता कर लिया कि चोर वही है।


तेनालीराम सबकी जिज्ञासा शांत करते हुए बोले,”मैंने पुजारी जी से कह कर काली माँ के पैरों पर तेज सुगन्धित इत्र छिड़कवा दिया था। जिस कारण जिसने भी माँ के पैर छुए उसके हाथ में वही सुगन्ध आ गयी। लेकिन जब मैंने सातवें अंगरक्षक के हाथ महके तो उनमे कोई खुशबु नहीं थी… उसने पकड़े जाने के डर से माँ काली की मूर्ति के पैर छूए ही नहीं। इसलिए यह साबित हो गया की उसी के मन में पाप था और वही चोर है।”


राजा कृष्ण देव राय एक बार फिर तेनालीराम की बुद्धिमत्ता के कायल हो गए। और उन्हें स्वर्ण मुद्राओं से सम्मानित किया।



# Tenaliram stories in Hindi - कुछ नहीं

तेनालीराम राजा कृष्ण देव राय के निकट होने के कारण बहुत से लोग उनसे जलते थे। उनमे से एक था रघु नाम का ईर्ष्यालु फल व्यापारी। उसने एक बार तेनालीराम को षड्यंत्र में फसाने की युक्ति बनाई। उसने तेनालीराम को फल खरीदने के लिए बुलाया। जब तेनालीराम ने उनका दाम पूछा तो रघु मुस्कुराते हुए बोला,


“आपके लिए तो इनका दाम ‘कुछ नहीं’ है।”


यह बात सुन कर तेनालीराम ने कुछ फल खाए और बाकी थैले में भर आगे बढ़ने लगे। तभी रघु ने उन्हें रोका और कहा कि मेरे फल के दाम तो देते जाओ।


तेनालीराम रघु के इस सवाल से हैरान हुए, वह बोले कि अभी तो तुमने कहा की फल के दाम ‘कुछ नहीं’ है। तो अब क्यों अपनी बात से पलट रहे हो। तब रघु बोला की, मेरे फल मुफ्त नहीं है। मैंने साफ-साफ बताया था की मेरे फलों का दाम कुछ नहीं है। अब सीधी तरह मुझे ‘कुछ नहीं’ दे दो, वरना मै राजा कृष्ण देव राय के पास फरियाद ले कर जाऊंगा और तुम्हें कठोर दंड दिलाऊँगा।


तेनालीराम सिर खुझाने लगे। और यह सोचते-सोचते वहाँ से अपने घर चले गए।


उनके मन में एक ही सवाल चल रहा था कि इस पागल फल वाले के अजीब षड्यंत्र का तोड़ कैसे खोजूँ। इसे कुछ नहीं कहाँ से लाकर दूँ।


अगले ही दिन फल वाला राजा कृष्ण देव राय के दरबार में आ गया और फरियाद करने लगा। वह बोला की तेनाली ने मेरे फलों का दाम ‘कुछ नहीं’ मुझे नहीं दिया है।


राजा कृष्ण देव राय ने तुरंत तेनालीराम को हाज़िर किया और उससे सफाई मांगी। तेनालीराम पहले से तैयार थे उन्होंने एक रत्न-जड़ित संदूक लाकर रघु फल वाले के सामने रख दिया और कहा ये लो तुम्हारे फलों का दाम।


उसे देखते ही रघु की आँखें चौंधिया, उसने अनुमान लगाया कि इस संदूक में बहुमूल्य हीरे-जवाहरात होंगे… वह रातों-रात अमीर बनने के ख्वाब देखने लगा। और इन्ही ख़यालों में खोये-खोये उसने संदूक खोला।


संदूक खोलते ही मानो उसका खाब टूट गया, वह जोर से चीखा, ” ये क्या? इसमें तो ‘कुछ नहीं’ है!”


तब तेनालीराम बोले, “बिलकुल सही, अब तुम इसमें से अपना ‘कुछ नहीं’ निकाल लो और यहाँ से चलते बनो।”


वहां मौजूद महाराज और सभी दरबारी ठहाका लगा कर हंसने लगे। और रघु को अपना सा मुंह लेकर वापस जाना पड़ा। एक बार फिर तेनालीराम ने अपने बुद्धि चातुर्य से महाराज का मन जीत लिया था।



# Tenali Rama Story In hindi  - जादूगर का घमंड

एक बार राजा कृष्ण देव राय के दरबार में एक जादूगर आया। उसने बहुत देर तक हैरतअंगेज़ जादू करतब दिखा कर पूरे दरबार का मनोरंजन किया। फिर जाते समय राजा से ढेर सारे उपहार ले कर अपनी कला के घमंड में सबको चुनौती दे डाली-


क्या कोई व्यक्ति मेरे जैसे अद्भुत करतब दिखा सकता है। क्या कोई मुझे यहाँ टक्कर दे सकता है?


इस खुली चुनौती को सुन कर सारे दरबारी चुप हो गए। परंतु तेनालीराम को इस जादूगर का यह अभिमान अच्छा नहीं लगा। वह तुरंत उठ खड़े हुए और बोले कि हाँ मैं तुम्हे चुनौती देता हूँ कि जो करतब मैं अपनी आँखें बंद कर के दिखा दूंगा वह तुम खुली आंखो से भी नहीं कर पाओगे। अब बताओ क्या तुम मेरी चुनौती स्वीकार करते हो?


जादूगर अपने अहम में अंध था। उसने तुरंत इस चुनौती को स्वीकार कर लिया।


तेनालीराम ने रसोइये को बुला कर उस के साथ मिर्ची का पाउडर मंगवाया। अब तेनालीराम ने अपनी आँखें बंद की और उनपर एक मुट्ठी मिर्ची पाउडर डाल दिया। फिर थोड़ी देर में उन्होंने मिर्ची पाउडर झटक कर कपड़े से आँखें पोंछ कर शीतल जल से अपना चेहरा धो लिया। और फिर जादूगर से कहा कि अब तुम खुली आँखों से यह करतब करके अपनी जादूगरी का नमूना दिखाओ।


घमंडी जादूगर को अपनी गलती समझ आ गयी। उसने माफी मांगी और हाथ जोड़ कर राजा के दरबार से चला गया।


राजा कृष्ण देव राय अपने चतुर मंत्री तेनालीराम की इस युक्ति से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होने तुरंत तेनालीराम को पुरस्कार दे कर सम्मानित किया और राज्य की इज्जत रखने के लिए धन्यवाद दिया।


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