गणेश चतुर्थी | Ganesh Chaturthi 2021 kab hai?

गणेश चतुर्दशी 2021 में कब है? | गणेश चतुर्थी कब है |गणेश चतुर्थी का महत्व |गणेश चतुर्थी  शुभ मुहुर्त | गणेश जी की पूजा विधि | गणेश जी की आरती | गणेश चतुर्थी कब और क्यों मनाई जाती है? | गणेश जी की पूजा सबसे पहले क्यों होती है | गणेश जी के 8 स्वरूप, जानें-क्या है महत्व | भगवान श्री गणेश के 10 प्रसिद्ध मंदिर |गणपति जी के 108 नाम

Ganesh Chaturthi

Ganesh Chaturthi 2021- गणेश चतुर्थी सनातन हिंदु धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है, इसे विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस साल गणेश चतुर्थी  (Ganesh Chaturthi 2021) का पावन पर्व 10 सितंबर 2021 को शुक्रवार के दिन पड़ रहा है। विनायक चतुर्थी को गणेश जी के जन्म दिन के रूप में भी मनाया जाता है। हिंदु पंचांग के अनुसार गणेश उत्सव भाद्रपद मास की चतुर्थी तिथि से चतुर्थदशी तक चलता है। इसके बाद चतुर्थदशी को भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार गणेश चतुर्थी  (Ganesh Chaturthi) के दिन गणपति भगवान का जन्म हुआ था। इस दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश जी की पूजा अर्चना के करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और कष्टों का निवारण होता है। 

Ganesh Chaturthi 2021 kab hai
Ganesh Chaturthi 2021 kab hai   


गणेश चतुर्थी का महत्व। 

गणेश चतुर्थी का साल भर में पड़ने वाली सभी चतुर्थियों में सबसे अहम महत्व है। इस दिन गणेश के भक्त अपने घर में भगवान गणेश को स्थापित करते हैं। बताया जाता है कि इस दिन गणेश जी की पूजा करने से घर में सुख, समृद्धि और संपन्नता आती है। इस दिन कई लोग व्रत रखते हैं। व्रत रखने से भगवान गणेश खुश होते हैं और श्रद्धालूओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। गणेश जी की मूर्ति को घर में मंदिर में रखना होता है। इनके लिए मंदिर में एक अलग जगह बनाई जाती है।


 गणेश चतुर्थी  शुभ मुहुर्त। 

गणेश चतुर्थी  का पावन पर्व 10 सितंबर 2021 को शुक्रवार के दिन से प्रारंभ हो रहा है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मध्याह्न काल गणेश पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। इस दौरान विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा अर्चना करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और कष्टों का निवारण होता है। इस दिन पूजा का शुभ मुहुर्त मध्याह्र काल में 11:03 से 13:33 तक है यानि 2 घंटे 30 मिनट तक है। 


गणेश पूजा का महत्व। 

गणेश जी की पूजा करने से सभी प्रकार के विघ्न दूर होते हैं इसीलिए भगवान गणेश को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है. गणेश जी की पूजा करने से शिक्षा में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं. इसके साथ ही रोग दूर होते हैं, धन से जुड़ी परेशानियां दूर होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त होता है. मान सम्मान में भी वृद्धि होती है. भगवान गणेश सभी प्रकार के दुखों का नाश भी करते हैं. बुधवार का दिन गणेश पूजा के लिए उत्तम माना गया है. 


गणेश जी की पूजा विधि। 

गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी की पूजा के कुछ नियम बताए गए हैं। गणेश चतुर्थी के दिन प्रात:काल उठकर नित्यक्रम से निवृत होकर स्नान करें, इसके बाद पूजा आरंभ करनी चाहिए. गणेश जी का ध्यान कर इस मंत्र ''ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात।।'' का उच्चारण कर और पूजा प्रारंभ करें यदि इस दिन व्रत रखना है तो विधि पूर्वक व्रत का संकल्प लें. पूर्व या उत्तर की तरफ मुख करके बैठकर पूजा प्रारंभ करें. गणेश जी को पुष्प, धूप, दीप, कपूर, रोली, मौली लाल, चंदन, मोदक आदि का चढ़ाएं।  

गणेश जी को सूखा सिंदूर का तिलक लगाएं. इसके उपरांत भगवान गणेश जी की आरती करें और गणेश मंत्र ( ॐ गं गणपतयै नम:') का जाप करें। इसके बाद श्री गणेश जी को सिंदूर लगाएं. ॐ गं गणपतयै नम:' मंत्र बोलते हुए दूर्वा अर्पित करें. पूजन के दौरान श्री गणेश स्तोत्र का पाठ करें।  भोग में लड्डू की थाली गणेश जी के सामने रखें. फिर पहले लड्डुओं का भोग वितरित कर दें, इसके बाद आप अपना उपवास खोले सकते हैं। 


#  गणेश जी की आरती

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

एकदंत, दयावन्त, चार भुजाधारी,

माथे सिन्दूर सोहे, मूस की सवारी। 

पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा,

लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा।। ..

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश, देवा।

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया,

बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया। 

'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।। 

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा .. 

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा। 

दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी। 

कामना को पूर्ण करो जय बलिहारी।


गणेश चतुर्थी कब और क्यों मनाई जाती है?

शिव पुराण और गणेश पुराण के अनुसार भाद्र माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेशजी का जन्म हुआ था। देश में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोगों में एकजुटता पैदा करने के उद्देश्य से लोकमान्य तिलक ने देश में गणेशोत्सव की शुरुआत की। इसके बाद से शुरु हुए इस पर्व पर घर-घर दस दिनों तक गणेशजी की स्थापना होने लगी।  

हिंदू धर्म कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद महीने की शुल्क चतुर्थी को गणेश चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। शिव पुराण के चतुर्थ खंड में बताया गया है कि माता पार्वती ने अपने अंग रक्षक के तौर पर भगवान गणेश को अपने शरीर पर लगे उबटन के लेप से तैयार किया और फिर उनमें प्राण फूंके। तभी से भाद्रपद माह की चतुर्थी को भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। 


गणेश जी की पूजा सबसे पहले क्यों होती है ?

हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य के आरंभ से पहले गणपति जी की पूजा की जाती है। शादी-विवाह हो या मुंडन संस्‍कार, गृह प्रवेश हों या माता की चौकी सभी शुभ कार्यों से पहले गणेशजी को पूजा जाता है। आइए जानते हैं ऐसा क्‍यों होता है…

गणेश जी की पूजा सबसे पहले क्यों होती है ?
गणेश जी की पूजा सबसे पहले क्यों होती है ?

गणेश चतुर्थी ही नहीं भगवान गजानन की पूजा अन्‍य त्‍योहारों पर ..भी सबसे पहले की जाती है। दरअसल इसके पीछे एक मान्‍यता है कि बप्‍पा हर प्रकार के विघ्‍न बाधा को हर लेते हें। उनकी पूजा करने से कोई भी कार्य बिना बाधा के पूर्ण होता है। जो भी कार्य आप करते हैं जो बिना रुकावट के अपने मुकाम को पहुंचता है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा भी है।


एक बार देवताओं के बीच में इस बात को लेकर विवाद हो गया कि धरती पर किसकी पूजा सबसे पहले की जाएगी। सभी देवतागण खुद को सबसे श्रेष्‍ठ बनाने लगे। तब नारदजी ने इस स्थिति को देखते हुए शिवजी की शरण में जाने की सलाह दी। जब सभी देवता शिवजी के पास पहुंचे तो उन्‍होंने सभी के बीच के विवाद को सुलझाने के लिए एक प्रतियोगिता का आयोजन रखा। उन्‍होंने सभी देवताओं से अपने -अपने वाहन पर बैठकर संपूर्ण ब्रह्मांड का चक्‍कर लगाने को कहा ..जो भी परिक्रमा करके सबसे पहले उनके पास पहुंचेगा, धरती पर उसकी ही पूजा की जाएगी।


सभी देवताअपने-अपने वाहन पर सवार होकर ब्रह्मांड का चक्‍कर चक्‍कर लगाने निकल पड़े। मगर गणेशजी अपने वाहन मूषक पर सवार सवार नहीं हुए। वह ब्रह्मांड का चक्‍कर लगाने की बजाए अपने माता-पिता के चारों ओर परिक्रमा करने लगे। उन्‍होंने माता -पिता के चारों ओर 7 बार परिक्रमा की और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। 

जब सभी देवता ब्रह्मांड का चक्‍कर लगाकर लौटे तो गणेशजी को वही .पर खड़ा पाया।  अब भगवान शिव प्रतयोगिता के विजेता के नाम की घोसणा करने चले गए। उन्‍होंने गणेशजी को विजयी घोषित किया। सभी देवता आश्‍चर्य में पड़ गए कि सभी देवता पूरे ब्रह्मांड का चक्‍कर लगाकर आए हैं उन्‍हें छोड़कर गणेशजी को क्‍यों विजेता घोषित किया गया। तब शिवजी ने बताया कि पूरे ब्रह्मांड में माता-पिता का स्‍थान सर्वोपरि है और गणेशजी ने अपने माता-पिता की परिक्रमा की है, इसलिए वह सभी देवताओं में सबसे पहले पूजनीय हैं। तभी से गणेशजी की पूजा सबसे पहले होने लगी। सभी देवताओं ने शिवजी के इस निर्णय को स्‍वीकार किया।


# गणेश जी के 8 स्वरूप, जानें-क्या है महत्व 

शिव और पार्वती के पुत्र गणेश जी जीवन की समस्याओं को हल करने में सबसे आगे रहते हैं. इसलिए इनकी पूजा सबसे पहले की जाती है. हालांकि इनके अनंत नाम और  अनगिनत स्वरूप हैं, परन्तु इनके आठ स्वरूप विशेष रूप से ऐसे हैं, जो किसी भी व्यक्ति की कमजोरियों को दूर करते हैं. अगर ये कमजोरियां दूर हो जाएं तो व्यक्ति जीवन में हर प्रकार से उन्नति कर सकता है. यहां तक कि ईश्वर की उपलब्धि भी 

ganesh ji image

कौन से हैं भगवान गणेश के आठ अवतार और किन कमजोरियों को ये दूर करते हैं?


1. भगवान गणेश  के अनेक स्वरूपों में उपासना की परंपरा है. मुद्गल पुराण के अनुसार भगवान गणेश के अनेक अवतार हैं, जिनमें आठ अवतार प्रमुख हैं.


2. हर अवतार का महत्व अलग-अलग असुरों के नाश के लिए हुआ था और इनकी अलग-अलग उपासना करने से मनुष्य अपनी मन की अलग-अलग वृत्तियों पर नियंत्रण पा सकता है.

3. पहला स्वरूप वक्रतुंड का है. इस स्वरूप में श्री गणेश जी ने मत्सरासुर का अहंकार भंग किया था.


4. दूसरा स्वरूप एकदंत का है. इस स्वरूप में उन्होंने  मदासुर को पराजित किया था.


5. तीसरा स्वरूप महोदर का है, जिसमें श्री गणेश ने मोहासुर का गर्व भंग किया था. यह ज्ञान का स्वरूप भी है। 


6. चौथा स्वरूप गजानन का है, इसमें प्रभु ने लोभासुर का अहंकार भंग किया था. यह स्वरूप सांख्य स्वरूप है। 


7. पांचवें लम्बोदर स्वरूप में श्री गणेश ने क्रोधासुर को परास्त किया था. यह स्वरूप शक्ति का स्वरूप है। 


8. छठवे श्री गणेश का नाम विकट है, इसमें उन्होंने कामासुर को परास्त किया था यह सौर का स्वरूप है। 


9. सातवां स्वरूप विघ्नराज का है. इस स्वरूप में उन्होंने ममतासुर का अहंकार नष्ट किया था. यह श्री विष्णु का स्वरूप है। 


10. आठवां स्वरूप धूम्रवर्ण का है, जिसमें उन्होंने अहंतासुर को परास्त किया था, यह शिव का स्वरूप है। 


# भगवान श्री गणेश के 10 प्रसिद्ध मंदिर

भगवान श्री गणेश के रूप में घर में सुख समृद्धी के प्रवेश का सूचक त्‍योहार गणेश चतुर्थी एक बार फिर आने को है। एक बार फिर बप्‍पा मोरया अपने भक्‍तों के घरों में कुछ दिनों के लिए वास करने आ रहे हैं। आगामी 17 सितंबर को होगा वो दिन जब हर कोई खुशी में झूम रहा होगा, 'देवा ओ देवा, गणपति देवा...' । बताते चलें कि इस त्‍योहार को विनायक चतुर्थी के नाम से भी जानते हैं। हिंदू कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद के महीने में शुक्‍ल चतुर्थी के दिन ये त्‍योहार हर साल मनाया जाता है। 

इस त्‍योहार पर भक्‍त भगवान श्री गणेश की प्रतिमा को घर में लाते हैं और 10 दिनों तक आरती-पूजन, भजन-कीर्तन आदि के साथ उनका स्‍वागत करते हैं। इसके बाद अनंत चर्तुदशी के दिन भगवान को भीगी पलकों के साथ, अगले साल फिर जल्‍दी आने का वादा लेकर विदा कर देते हैं। आइए आने वाले गणेश चतुर्थी पर्व की दस दिन की रौनक पर जानें भारत में कौन से हैं बप्‍पा मोरया के 10 खास और बड़े मंदिर। यहां उमड़ती बप्‍पा के भक्‍तों की जबरदस्‍त भीड़।


1. सिद्घिविनायक मंदिर, मुंबई

सिद्घिविनायक गणेश जी ये सबसे लोकप्रिय रूप है। गणेश जी की जिन प्रतिमाओं की उनकी सूड़ दाईं ओर मुड़ी होती है, वे सिद्घपीठ से जुड़ी होती हैं और उनके मंदिर सिद्घिविनायक मंदिर कहलाते हैं। कहते हैं कि सिद्धि विनायक की महिमा अपरंपार है, वे भक्तों की मनोकामना को तुरंत पूरा करते हैं। मान्यता है कि ऐसे गणपति बहुत ही जल्दी प्रसन्न होते हैं और उतनी ही जल्दी कुपित भी होते हैं। मुंबई का ये सिद्घिविनायक मंदिर सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्िक विदेशों में भी काफी विख्यात है।


2. रणथंभौर गणेश जी, राजस्थान

रणथंभौर गणेश जी रणथंभौर किले के महल पर बहुत पुराना मंदिर है। ये मंदिर करीब 1000 साल पुराना है। यहां तीन नेत्र वाले गणेश जी आपको मिलेंगे। ये गणेश जी नारंगी रंग के हैं और विदेशियों के बीच काफी प्रचलित हैं। दूर-दूर से लोग यहां बप्पा के इस अद्भुत रूप का दर्शन करने के लिए आते हैं। उनके वाहन मूशक (चूहे) को भी यहां रखा गया है।


3. मंडई गणपति, पुणे

मंडई के गणेश मंडल को भक्त अखिल मंडई गणपति के नाम से भी जानते हैं। पुणे में इस गणेश मंडल का खासा महत्व है। गणपति महोत्सव के दौरान यहां भक्तों की बड़ी भीड़ उमड़ती है। वहीं दूर-दूर से लोग इनके दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं।


4. उच्ची पिल्लैयार मंदिर, रॉकफोर्ट

दक्षिण भारत का प्रसिद्ध पहाड़ी किला मंदिर तमिलनाडु राज्य के त्रिची शहर के मध्य पहाड़ के शिखर पर स्थित है। चैल राजाओं की ओर से चट्टानों को काटकर इस मंदिर का निर्माण किया गया था। यहां भगवान श्री गणेश का मंदिर है। पहाड़ के शिखर पर विराजमान होने के कारण गणेश जी को उच्ची पिल्लैयार कहते हैं। यहां दूर-दूर से दर्शनार्थी दर्शन करने के लिए आते हैं।


5. श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई मंदिर, पुणे

श्रीमंत दगड़ूशेठ हलवाई गणपति मंदिर में भक्तों की भगवान के प्रति आस्था साफ नजर आती है। कोई इन्हें फूलों से सजाता है, तो कोई इन्हे सोने से लाद देता है, तो कोई इन्हे मिठाई से सजाता है, तो कोई नोटों से पूरे मंदिर को ढक देता है। वहीं इस बार अक्षय तृतीया के मौके पर पुणे के रहने वाले एक आम विक्रेता ने गणपति के इस मंदिर और गणपति को पूरा का पूरा आम से ही शृंगार कर डाला था। भक्त की भगवान के प्रति इस तरह की कई अनोखी आस्थाओं का उदाहरण देखने को मिलता है भगवान गणेश के इस मंदिर में।


6. कनिपक्कम विनायक मंदिर, चित्तूर

आस्था और चमत्कार की ढेरों कहानियां खुद में समेटे कनिपक्कम विनायक का ये मंदिर आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले में मौजूद है। इस मंदिर की स्थापना 11वीं सदी में चोल राजा कुलोतुंग चोल प्रथम ने की थी। बाद में इसका विस्तार 1336 में विजयनगर साम्राज्य में किया गया। जितना प्राचीन ये मंदिर है उतनी ही दिलचस्प इसके निर्माण के पीछे की कहानी भी है। कहते हैं यहां हर दिन गणपति का आकार बढ़ता ही जा रहा है। साथ ही ऐसा भी मानते हैं कि अगर कुछ लोगों के बीच में कोई लड़ाई हो, तो यहां प्रार्थना करने से वो लड़ाई खत्म हो जाती है।  


7. मनाकुला विनायगर मंदिर, पांडिचेरी

भगवाग श्री गणेश का ये मंदिर पांडिचेरी में स्िथत है। पर्यटकों के बीच ये मंदिर आकर्षण का विशेष केंद्र है। प्राचीन काल का होने के कारण इस मंदिर की बड़ी मान्यता है। कहते हैं कि क्षेत्र पर फ्रांस के कब्जे से पहले का है ये मंदिर। दूर दराज से भक्त यहां भगवान श्रीगणेश के दर्शन करने आते हैं।


8. मधुर महा गणपति मंदिर, केरल

इस मंदिर से जुड़ी सबसे रोचक बात ये है कि शुरुआत में ये भगवान शिव का मंदिर हुआ करता था, लेकिन पुरानी कथा के अनुसार पुजारी के बेटे ने यहां भगवान गणेश की प्रतिमा का निर्माण किया। पुजारी का ये बेटा छोटा सा बच्चा था। खेलते-खेलते मंदिर के गर्भगृह की दीवार पर बनाई हुई उसकी प्रतिमा धीरे-धीरे अपना आकार बढ़ाने लगी। वो हर दिन बड़ी और मोटी होती गई। उस समय से ये मंदिर भगवान गणेश का बेहद खास मंदिर हो गया।


9. गणेश टोक, गंगटोक, सिक्िकम

गणेश टोक मंदिर गंगटोक-नाथुला रोड से करीब 7 किलोमीटर की दूरी पर स्िथत है। यह यहां करीब 6,500 फीट की ऊंची पहाड़ी पर स्िथत है। इस मंदिर के वैज्ञानिक नजरिए पर गौर करें तो इस मंदिर के बाहर खड़े होकर आप पूरे शहर का नजारा एकसाथ ले सकते हैं।


10. मोती डूंगरी गणेश मंदिर, जयपुर

मोती डूंगरी गणेश मंदिर राजस्थान में जयपुर के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है। लोगों की इसमें विशेष आस्था तथा विश्वास है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर यहाँ काफ़ी भीड़ रहती है और दूर-दूर से लोग दर्शनों के लिए आते हैं। भगवान गणेश का यह मंदिर जयपुर वासियों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इतिहासकार बताते हैं कि यहां स्थापित गणेश प्रतिमा जयपुर नरेश माधोसिंह प्रथम की पटरानी के पीहर मावली से 1761 में लाई गई थी। मावली में यह प्रतिमा गुजरात से लाई गई थी। उस समय यह पांच सौ वर्ष पुरानी थी। जयपुर के नगर सेठ पल्लीवाल यह मूर्ति लेकर आए थे और उन्हीं की देखरेख में मोती डूंगरी की तलहटी में गणेशजी का मंदिर बनवाया गया था।


# गणपति जी के 108 नाम

भगवान शिव ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया था कि जब पूजा होगी तो सबसे पहले आपका ही स्मरण होगा, इसलिये ही उन्हें प्रथम पूज्य कहा जाता है। गजानन महाराज के 108 नामों को गणेश नामावली कहते हैं। इस नामावली का जाप करने से मंगलमूर्ति समस्त कष्टों को दूर करते हैं। 

1. बालगणपति : सबसे प्रिय बालक

2. भालचन्द्र : जिसके मस्तक पर चंद्रमा हो

3. बुद्धिनाथ : बुद्धि के भगवान

4. धूम्रवर्ण : धुंए को उड़ाने वाले 

5. एकाक्षर: एकल अक्षर

6. एकदन्त: एक दांत वाले

7. गजकर्ण : हाथी की तरह आंखों वाले

8. गजानन: हाथी के मुख वाले भगवान

9. गजवक्र : हाथी की सूंड वाले 

10. गजवक्त्र:  हाथी की तरह मुंह है

11. गणाध्यक्ष : सभी जनों के मालिक

12. गणपति : सभी गणों के मालिक

13. गौरीसुत : माता गौरी के बेटे 

14. लम्बकर्ण : बड़े कान वाले देव

15. लम्बोदर: बड़े पेट वाले 

16. महाबल: अत्यधिक बलशाली  

17. महागणपति: देवादिदेव

18. महेश्वर: सारे ब्रह्मांड के भगवान

19. मंगलमूर्ति : सभी शुभ कार्यों के देव

20. मूषकवाहन : जिनका सारथी मूषक है

21. निदीश्वरम : धन और निधि के दाता

22. प्रथमेश्वर : सब के बीच प्रथम आने वाले 

23. शूपकर्ण : बड़े कान वाले देव

24. शुभम : सभी शुभ कार्यों के प्रभु

25. सिद्धिदाता:  इच्छाओं और अवसरों के स्वामी

26. सिद्दिविनायक : सफलता के स्वामी

27. सुरेश्वरम : देवों के देव। 

28. वक्रतुण्ड : घुमावदार सूंड वाले 

29. अखूरथ : जिसका सारथी मूषक है

30. अलम्पता: अनन्त देव। 

31. अमित: अतुलनीय प्रभु

32. अनन्तचिदरुपम : अनंत और व्यक्ति चेतना वाले 

33. अवनीश : पूरे विश्व के प्रभु

34. अविघ्न : बाधाएं हरने वाले। 

35. भीम: विशाल

36. भूपति: धरती के मालिक  

37. भुवनपति: देवों के देव। 

38. बुद्धिप्रिय : ज्ञान के दाता 

39. बुद्धिविधाता : बुद्धि के मालिक

40. चतुर्भुज: चार भुजाओं वाले

41. देवादेव : सभी भगवान में सर्वोपरि 

42. देवांतकनाशकारी: बुराइयों और असुरों के विनाशक

43. देवव्रत : सबकी तपस्या स्वीकार करने वाले

44. देवेन्द्राशिक : सभी देवताओं की रक्षा करने वाले

45. धार्मिक : दान देने वाले 

46. दूर्जा: अपराजित देव

47. द्वैमातुर : दो माताओं वाले

48. एकदंष्ट्र: एक दांत वाले

49. ईशानपुत्र : भगवान शिव के बेटे

50. गदाधर : जिनका हथियार गदा है

51. गणाध्यक्षिण : सभी पिंडों के नेता

52. गुणिन: सभी गुणों के ज्ञानी

53. हरिद्र : स्वर्ण के रंग वाले

54. हेरम्ब : मां का प्रिय पुत्र

55. कपिल : पीले भूरे रंग वाले 

56. कवीश : कवियों के स्वामी

57. कीर्ति: यश के स्वामी

58. कृपाकर : कृपा करने वाले

59. कृष्णपिंगाश : पीली भूरी आंख वाले

60. क्षेमंकरी : माफी प्रदान करने वाला

61. क्षिप्रा : आराधना के योग्य

62. मनोमय: दिल जीतने वाले

63. मृत्युंजय : मौत को हराने वाले

64. मूढ़ाकरम : जिनमें खुशी का वास होता है

65. मुक्तिदायी : शाश्वत आनंद के दाता

66. नादप्रतिष्ठित : जिन्हें संगीत से प्यार हो

67. नमस्थेतु : सभी बुराइयों पर विजय प्राप्त करने वाले

68. नन्दन: भगवान शिव के पुत्र  

69. सिद्धांथ: सफलता और उपलब्धियों के गुरु

70. पीताम्बर : पीले वस्त्र धारण करने वाले 

71. प्रमोद : आनंद   72. पुरुष : अद्भुत व्यक्तित्व

73. रक्त : लाल रंग के शरीर वाले 

74. रुद्रप्रिय : भगवान शिव के चहेते

75. सर्वदेवात्मन : सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकर्ता  

76) सर्वसिद्धांत : कौशल और बुद्धि के दाता

77. सर्वात्मन : ब्रह्मांड की रक्षा करने वाले 

78. ओमकार : ओम के आकार वाले 

79. शशिवर्णम : जिनका रंग चंद्रमा को भाता हो

80. शुभगुणकानन : जो सभी गुणों के गुरु हैं

81. श्वेता : जो सफेद रंग के रूप में शुद्ध हैं 

82. सिद्धिप्रिय : इच्छापूर्ति वाले

83. स्कन्दपूर्वज : भगवान कार्तिकेय के भाई

84. सुमुख: शुभ मुख वाले

85. स्वरूप : सौंदर्य के प्रेमी

86. तरुण : जिनकी कोई आयु न हो

87. उद्दण्ड: शरारती

88. उमापुत्र : पार्वती के पुत्र 

89. वरगणपति : अवसरों के स्वामी

90. वरप्रद : इच्छाओं और अवसरों के अनुदाता

91. वरदविनायक: सफलता के स्वामी

92. वीरगणपति: वीर प्रभु

93. विद्यावारिधि : बुद्धि के देव

94. विघ्नहर : बाधाओं को दूर करने वाले

95. विघ्नहत्र्ता: विघ्न हरने वाले 

96. विघ्नविनाशन : बाधाओं का अंत करने वाले

97. विघ्नराज : सभी बाधाओं के मालिक

98. विघ्नराजेन्द्र : सभी बाधाओं के भगवान

99. विघ्नविनाशाय : बाधाओं का नाश करने वाले 

100. विघ्नेश्वर :  बाधाओं के हरने वाले भगवान

101. विकट : अत्यंत विशाल

102. विनायक : सब के भगवान

103. विश्वमुख : ब्रह्मांड के गुरु

104. विश्वराजा : संसार के स्वामी

105. यज्ञकाय : सभी बलि को स्वीकार करने वाले 

106. यशस्कर : प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी

107. यशस्विन : सबसे प्यारे और लोकप्रिय देव

108.  योगाधिप : ध्यान के प्रभु 


मुझे उम्मीद है आपको जानकारी पसंद आई होगी। आपने हमें इतना समय दिया आपका बहुत धन्यवाद।